सुनहरी लाल, हलवाई की बुझी भट्टी के
इर्द-गिर्द ऊँघता रहा रात-भर
सुनहरी लाल, कुत्ते की तरह चाटता रहा
रोज-रोज जूठन
फिर भी कितना खुश था सुनहरी लाल
उसके पास थे उसके अपने सपने
मस्त था वह अपनी चमेली में
बिखेरती थी जो प्यारी गंध रोज-रोज
खुशी मिलती थी उसे पप्पू मुनिया की
बाल सुलभ चपलता पर
आशा थी उसे पूर्ण आशा कि
उगेगा सूरज एक दिन झोंपड़ी के भीतर
फैलाएगा प्रकाश उसकी अँधेरी दुनिया में
बाँटेगा रोशनी उस जैसे बदनसीबों को
पर तुम्हारा क्या बिगाड़ा था उसने
जो बता दी तुमने सपनों की बात
कुछ इस तरह कि
सुनहरी लाल ने खा लिया जहर एक दिन
क्या मालूम है तुमको यह
उसका बेटा अब सोने से भी डरता है
भगवान का वास्ता है तुम्हें
अब आगे कुछ मत कहना उससे
मैं समझाऊँगा सुनहरी लाल के बेटे को
हकीकत के बारे में / सपनों के बारे में
गंतव्य या मार्ग की पहचान के बारे में .
- शून्य आकांक्षी