सीता सावित्री गांधारी
तुमने क्यों ढला ऐसा साँचा
जो कारागार बन गया है अब
क्यों लेना पड़ता है उन्हें
अज्ञात नाम का सहारा
जो लिखना चाहती हैं असली सच
क्यों नहीं है अभी भी सरल
अभिव्यक्त करने को स्वतंत्र विचार
क्यों नहीं आती है कोई लेखनी आगे
रचने को आपके अपने मूल्य
कहाँ है प्लेटफोर्म जहाँ मुक्त हैं आप कारा से
कहाँ ढूँढें हम आपकी स्वतंत्रता
समाज में
राजनीति में
या फिर सांस्कृतिक/आर्थिक/शैक्षिक गतिविधियों में
गाँव कसबे शहर
घर घेर स्कूल ससुराल बच्चे
बस यही है वह परिधि जिसके भीतर स्वतंत्र हैं आप
कितना आसान है शोर करना ऑफिस की आजादी का
पर क्या सचमुच इस आजादी की डोर
नहीं है हाथ महंगाई के
क्या घर/ऑफिस का कोई कमरा
है आपका अपना
यहाँ तक क़ि आपका अपना समय
वह भी नहीं है आपका
सचमुच भारतीय साहित्य का इतिहास आधा है
काश कोई अम्बेडकर
आपके यहाँ भी हो जाता/जाती पैदा.
- शून्य आकांक्षी