सुनहरी लाल, हलवाई की बुझी भट्टी के
इर्द-गिर्द ऊँघता रहा रात-भर
सुनहरी लाल, कुत्ते की तरह चाटता रहा
रोज-रोज जूठन
फिर भी कितना खुश था सुनहरी लाल
उसके पास थे उसके अपने सपने
मस्त था वह अपनी चमेली में
बिखेरती थी जो प्यारी गंध रोज-रोज
खुशी मिलती थी उसे पप्पू मुनिया की
बाल सुलभ चपलता पर
आशा थी उसे पूर्ण आशा कि
उगेगा सूरज एक दिन झोंपड़ी के भीतर
फैलाएगा प्रकाश उसकी अँधेरी दुनिया में
बाँटेगा रोशनी उस जैसे बदनसीबों को
पर तुम्हारा क्या बिगाड़ा था उसने
जो बता दी तुमने सपनों की बात
कुछ इस तरह कि
सुनहरी लाल ने खा लिया जहर एक दिन
क्या मालूम है तुमको यह
उसका बेटा अब सोने से भी डरता है
भगवान का वास्ता है तुम्हें
अब आगे कुछ मत कहना उससे
मैं समझाऊँगा सुनहरी लाल के बेटे को
हकीकत के बारे में / सपनों के बारे में
गंतव्य या मार्ग की पहचान के बारे में .
- शून्य आकांक्षी
Friday, 23 December 2011
Tuesday, 27 September 2011
आपकी आजादी
सीता सावित्री गांधारी
तुमने क्यों ढला ऐसा साँचा
जो कारागार बन गया है अब
क्यों लेना पड़ता है उन्हें
अज्ञात नाम का सहारा
जो लिखना चाहती हैं असली सच
क्यों नहीं है अभी भी सरल
अभिव्यक्त करने को स्वतंत्र विचार
क्यों नहीं आती है कोई लेखनी आगे
रचने को आपके अपने मूल्य
कहाँ है प्लेटफोर्म जहाँ मुक्त हैं आप कारा से
कहाँ ढूँढें हम आपकी स्वतंत्रता
समाज में
राजनीति में
या फिर सांस्कृतिक/आर्थिक/शैक्षिक गतिविधियों में
गाँव कसबे शहर
घर घेर स्कूल ससुराल बच्चे
बस यही है वह परिधि जिसके भीतर स्वतंत्र हैं आप
कितना आसान है शोर करना ऑफिस की आजादी का
पर क्या सचमुच इस आजादी की डोर
नहीं है हाथ महंगाई के
क्या घर/ऑफिस का कोई कमरा
है आपका अपना
यहाँ तक क़ि आपका अपना समय
वह भी नहीं है आपका
सचमुच भारतीय साहित्य का इतिहास आधा है
काश कोई अम्बेडकर
आपके यहाँ भी हो जाता/जाती पैदा.
- शून्य आकांक्षी
तुमने क्यों ढला ऐसा साँचा
जो कारागार बन गया है अब
क्यों लेना पड़ता है उन्हें
अज्ञात नाम का सहारा
जो लिखना चाहती हैं असली सच
क्यों नहीं है अभी भी सरल
अभिव्यक्त करने को स्वतंत्र विचार
क्यों नहीं आती है कोई लेखनी आगे
रचने को आपके अपने मूल्य
कहाँ है प्लेटफोर्म जहाँ मुक्त हैं आप कारा से
कहाँ ढूँढें हम आपकी स्वतंत्रता
समाज में
राजनीति में
या फिर सांस्कृतिक/आर्थिक/शैक्षिक गतिविधियों में
गाँव कसबे शहर
घर घेर स्कूल ससुराल बच्चे
बस यही है वह परिधि जिसके भीतर स्वतंत्र हैं आप
कितना आसान है शोर करना ऑफिस की आजादी का
पर क्या सचमुच इस आजादी की डोर
नहीं है हाथ महंगाई के
क्या घर/ऑफिस का कोई कमरा
है आपका अपना
यहाँ तक क़ि आपका अपना समय
वह भी नहीं है आपका
सचमुच भारतीय साहित्य का इतिहास आधा है
काश कोई अम्बेडकर
आपके यहाँ भी हो जाता/जाती पैदा.
- शून्य आकांक्षी
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